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परस्परोपग्रहो जीवानाम् — आत्मा आत्मा की सेवा करती है।

परस्परोपग्रहो जीवानाम्

"आत्मा आत्मा की सेवा करती है।"

तत्त्वार्थसूत्र, अध्याय 5, सूत्र 21

जीव अनादि से समूह में रहते हैं। जैसे निगोद में तो अनन्त जीव एक ही शरीर में रहते हैं और आगे जब वे जीव एकेन्द्रियादि में जाते हैं तब भी वे प्राय: समूह में ही रहते हैं। इस प्रकार जीव जब तक सशरीर हैं तब तक वे कर्मों के कारण एक-दूसरे के परिणमन में निमित्त बनते हैं। जब किसी जीव का साता या असाता कर्मों का उदय होता है या अन्य किसी भी कर्म का उदय होता है, तब उस जीव के कोई न कोई निमित्त अवश्य बनते हैं क्योंकि कोई भी कार्य होने के लिये पाँचों समवायों का एकत्रीकरण अनिवार्य है। उन पाँच समवायों में निमित्त भी शामिल है।

इस प्रकार अनादि से जीव एक-दूसरे से रागद्वेष करते हुए पुराने कर्मों को खपाते हैं और नये कर्मों को बाँधते हैं। पुराने कर्मों को भोगने में और नये कर्मों को बाँधने में जीव एक-दूसरे के निमित्त बनते हैं। जब कोई जीव वैराग्यादि योग्यतापूर्वक इच्छाओं का नाश करके आत्मसन्मुखता पाता है तब उसे आत्मानुभूति होती है यानी वह सम्यग्दर्शन पा लेता है।

ऐसे ज्ञानी जीव को सहज ही करुणा से प्रेरित होकर अन्य जीवों को यह उत्कृष्ट वस्तु प्रदान करने का जो भाव आता है वह इस जगत का सर्वोत्कृष्ट उपकार है।

इसी लिये हम भगवान की पूजा-वन्दना करते हैं क्योंकि भगवान ने ही हमें यह उत्कृष्ट मार्ग बताया है। यहाँ जिस उपकार की बात हम कर रहे हैं वह केवल निमित्त-नैमित्तिक सम्बन्ध की अपेक्षा से ही है क्योंकि दो द्रव्यों में कर्ता-कर्म सम्बन्ध कभी होता ही नहीं! कर्ता-कर्म सम्बन्ध केवल उपादान में ही होता है, निमित्त में नहीं होता क्योंकि उपादान स्वयं ही कार्यरूप से परिणमता है, निमित्त नहीं परिणमता।