आध्यात्मिक लेखन · हिन्दी
CA. Jayesh Sheth के आत्मज्ञान, आत्मा और धर्म पर हिन्दी निबंध और प्रवचन।
Essay · निबंध
जब कोई जीव वैराग्य आदि योग्यताओं को प्राप्त करता है, तभी वह आत्मसन्मुख होता है। आत्मसन्मुख होने के पश्चात ही वह आत्मानुभूति कर पाता है। उस समय उसका 'मैंपन' ज्ञानसामान्यभावरूपी शुद्धात्मा में स्थित होता है। ऐसा जीव सम्यग्दृष्टि अर्थात् ज्ञानी कहलाता है।
वैराग्य आदि योग्यताओं के अभाव में आत्मा बहिरात्मा बनी रहती है। जब तक बाह्य पदार्थों में सुख की बुद्धि बनी रहती है, तब तक आत्मानुभूति नहीं होती। बहिरात्मा व्यक्ति को यह भ्रम रहता है कि सुख बाहर से प्राप्त होता है। इसलिए वह बाह्य वस्तुओं या व्यक्तियों के पीछे दौड़ता रहता है और इच्छित वस्तु या व्यक्ति मिलने पर उनके अधीन हो जाता है।
यदि कोई ऐसा सुख चाहता है जो कभी समाप्त न हो — अव्याबाध, नित्य और शाश्वत हो — तो वह केवल आत्मानुभूति से ही संभव है। आत्मानुभूति के बिना मोक्षमार्ग में प्रवेश ही नहीं होता, और आत्मप्राप्ति के बिना अनन्त अव्याबाध सुखरूप मोक्ष की प्राप्ति असंभव है।
केवल आत्मप्राप्ति के लक्ष्य से वैराग्य प्राप्त करने के लिए बारह भावना, चार भावना, धर्मध्यान, "धन्यवाद! स्वागतम्!" आदि का अभ्यास करना चाहिए और निरंतर स्वयं की जांच करते रहना चाहिए।
आत्मपरीक्षण के लिए स्वयं से ये प्रश्न पूछने चाहिए:
इन प्रश्नों से यह स्पष्ट हो जाएगा कि मेरी बहिर्मुखता या परसन्मुखता कितनी है। फिर इस बहिर्मुखता का उपचार बारह भावना आदि के अभ्यास से करते हुए अपने अभिप्राय को आत्मसन्मुख बनाते रहना ही आत्मानुभूति का मार्ग है।
— जयेश मोहनलाल शेठ